गुरुद्वारा नानकसर में श्रद्धा के साथ मनाया गया श्री गुरु अर्जन देव जी का शहीदी पर्व

 

भोपाल। हमीदिया रोड स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा नानकसर साहिब में सिख इतिहास के प्रथम शहीद, शांति के पुंज और शहीदों के सरताज श्री गुरु अर्जन देव जी महाराज का शहीदी गुरुपर्व श्रद्धा, सत्कार और वैराग्यमयी वातावरण में मनाया गया। इस विशेष समागम में भोपाल के विभिन्न क्षेत्रों से आए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में हाजिरी भरकर गुरु साहिब के महान बलिदान को नमन किया।

धार्मिक दीवान में पटियाला से विशेष रूप से पधारे सुप्रसिद्ध विद्वान एवं प्रचारक ज्ञानी सुच्चा सिंह निरवाण ने संगत को श्री गुरु अर्जन देव जी के जीवन दर्शन और उनकी शहादत के महत्व से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1606 में मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में लाहौर में गुरु जी को बंदी बनाया गया था। गुरु जी के बढ़ते आध्यात्मिक प्रभाव और सिख धर्म के व्यापक प्रचार से कुछ विरोधी तत्व असंतुष्ट थे, जिसके चलते उन्हें अमानवीय और कठोर यातनाएं दी गईं।

ज्ञानी जी ने बताया कि गुरु महाराज को तपते लोहे के तवे पर बिठाया गया, उनके पावन शरीर पर तप्त रेत डाली गई और खौलते पानी से यातनाएं दी गईं। इसके बावजूद गुरु साहिब अकाल पुरख की रजा को सहर्ष स्वीकार करते हुए अडिग रहे और उनकी पावन रसना से यह अमर वाणी निकली— “तेरा कीआ मीठा लागै, हरि नामु पदारथु नानक मांगै।” उनका यह बलिदान धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकारों और सत्य के लिए संघर्ष का अमर प्रतीक बन गया।

समागम में गुरु महाराज के ऐतिहासिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि उन्होंने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ ‘आदि ग्रंथ साहिब’ का संकलन कराया, जो आगे चलकर ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के शाश्वत स्वरूप में प्रतिष्ठित हुआ। गुरु जी की शहादत ने सिख पंथ को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा दी। इसके पश्चात उनके सुपुत्र श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने ‘मीरी-पीरी’ की दो तलवारें धारण कर सिख कौम में ‘संत-सिपाही’ की गौरवशाली परंपरा को सुदृढ़ किया।

विशेष दीवान के दौरान ज्ञानी कुलविंदर सिंह एवं ज्ञानी यशपाल सिंह ने गुरुबाणी कीर्तन प्रस्तुत कर संगत को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर भीषण गर्मी को देखते हुए गुरुद्वारा साहिब परिसर एवं प्रमुख मार्गों पर मीठे जल की छबील लगाई गई, जहां संगत एवं राहगीरों को शीतल जल वितरित कर मानवता की सेवा की गई। समागम के समापन पर अरदास उपरांत गुरु का अटूट लंगर बरताया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर धर्म लाभ प्राप्त किया।

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