होली पर्व की पौराणिक पृष्ठभूमि एवं क्षेत्रीय परंपरायें वैभव वर्मा की कलम से

हिंदू संस्कृति में प्रचलित समस्त उत्सव का अपना एक विशेष महत्व है, जिसमें से ही एक महत्वपूर्ण पर्व है होली जिसे महापर्व के रूप में भी परिभाषित किया जाता है । इसका सर्वसामान्य स्वरूप केवल भारत के विभिन्न भागों में ही नहीं, अपितु विश्व के अन्य राष्ट्रों में भी किसी न किसी रूप में पाया जाता है । मूलतः यह उत्सव दो भागों में मनाया जाता है, एक है हमारी परंपरा व शास्त्रविधान को मानते हुए होलिका दहन और दूसरा उसके अगले दिन झूमर-बसंत आदि रागों को गा-बजाकर, रंगों के साथ उत्सव मनाना । इन सभी के साथ यह पर्व अपने आप में आनंद लिए होता है ।

होली पर्व का मूल होलिका की कथा में है, जो कि हिरण्यकश्यपु की बहन थी । हिरणकश्यपु ने स्वयं को अजेय माना एवं भगवान के रूप में पूजे जाने का आदेश दिया किंतु भगवान विष्णु के परमभक्त, उसके अपने पुत्र प्रहलाद ने इस आदेश की अव्हेलना की जिसके दंडस्वरूप उसने भक्त प्रहलाद को मारने की विभिन्न चेष्टायें की किंतु वह असफल रहा, अंत में उसकी बहन होलिका, जिसे अग्नि में ना जलने का वरदान प्राप्त था वह भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश कर गई किंतु ईश्वरीय महिमा से होलिका तो उस अग्नि में जल गई किंतु भक्त प्रहलाद सुरक्षित रहा । होलिका दहन की यह परंपरा इसी कारण आरंभ हुई इस उत्सवाग्नि को पुनीत माना जाता है ।

इस जीवंत त्यौहार को भारत के विभिन्न विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है,

होली उत्तरप्रदेश के सबसे लोकप्रिय और दिलचस्प त्योहारों में से एक है यहां मथुरा, वृंदावन की गलियों में होली को बहुत ही भव्य तरीके से मनाया जाता है एवं लठमार होली यहां की एक महत्वपूर्ण व प्रसिद्ध परंपरा है ।

पंजाब में कई स्थानों पर होली के अगले दिन होला मोहाला उत्सव मनाया जाता है जिसमें विभिन्न प्रकार की कलाओं का प्रदर्शन, कुश्ती, कविता वाचन एवं भोज होता है ।

बिहार राज्य में होली फगुवा नाम से प्रसिद्ध है, यहां इसमें नृत्य एवं लोकगीत शामिल होते हैं एवं रंगों का उपयोग प्रचुर मात्रा में होता है ।

पश्चिम बंगाल में इसे कई क्षेत्रों में डोलयात्रा के रूप में मनाया जाता है एवं यह भी श्रीकृष्ण को समर्पित है ।

मणिपुर में यह पर्व यह यावोल शांग नाम से पांच दिवसीय महोत्सव के रूप में होता है वहीं केरल में इसे कुछ जगह मंजुल कुली कहा जाता है एवं दो दिवसीय पूजा-पाठ अर्चना के विभिन्न आयोजन किए जाते हैं ।

इस प्रकार हम देखते हैं भारत में अलग-अलग जगह अलग-अलग प्रकार की परंपराओं के साथ यह महापर्व मनाया जाता है ।

होली सर्वसाधारण का पर्व है इस दिन छोटे-बड़े, ऊंच-नीच, भेदभाव मिटाकर सभी समरसता के साथ पर्व को मनाते है । होली एक ऐसा पर्व है जो खुशियों, रंगो, उत्साह और सौहार्द्र का प्रतीक है यह सर्दियों को विदा करने के साथ ही बसंत ऋतु का भी स्वागत करता है ।

इस बहुप्रतीक्षित महापर्व होली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

लेखक वैभव वर्मा 

 

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