विश्व राजनीति के शोर के बीच भारत की संयमित कूटनीति – डॉ. राघवेंद्र शर्मा

हमारे विद्वानों ने सदियों पहले ही चेताया था—

“बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।”

अर्थात बिना सोच-विचार के कही गई बात या किया गया कार्य अंततः व्यक्ति को स्वयं ही कठिनाई में डाल देता है। आज का वैश्विक परिदृश्य इस सत्य को फिर से प्रमाणित करता दिखाई देता है। दुनिया के अनेक शक्तिशाली देश और उनके नेता जिस प्रकार लगातार आक्रामक बयानबाजी, धमकियों और विरोधाभासी दावों में उलझे हुए हैं, उसने उनकी विश्वसनीयता को कमजोर किया है।

वर्तमान समय में विश्व का बड़ा हिस्सा युद्ध, तनाव और अविश्वास के दौर से गुजर रहा है। एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है, तो दूसरी ओर रूस और यूक्रेन का युद्ध लंबे समय से वैश्विक अस्थिरता का कारण बना हुआ है। पश्चिम एशिया में इजरायल और उसके विरोधी गुटों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा और सामरिक हितों को लेकर असुरक्षा की भावना बनी हुई है। इन परिस्थितियों में कई वैश्विक नेताओं द्वारा दिए गए आक्रामक और त्वरित बयान बाद में स्वयं उनके लिए असहजता का कारण बनते दिखाई दिए।

युद्ध और कूटनीति दोनों में सबसे महत्वपूर्ण तत्व विश्वसनीयता होती है। लेकिन जब कोई राष्ट्र पहले कठोर चेतावनी देता है और कुछ समय बाद समझौते की भाषा बोलने लगता है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने उसकी नीति को लेकर भ्रम पैदा होता है। हाल के वर्षों में दुनिया ने कई ऐसे उदाहरण देखे हैं, जहाँ सार्वजनिक बयान और वास्तविक रणनीति के बीच बड़ा अंतर दिखाई दिया। इससे वैश्विक नेतृत्व की गंभीरता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

आज स्थिति यह बन गई है कि जो देश कल तक एक-दूसरे के कट्टर विरोधी माने जाते थे, वे भी बातचीत और समझौते के रास्ते तलाशने को मजबूर हैं। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वास्तविकता है कि अंततः युद्ध की आग को संवाद से ही शांत करना पड़ता है। लेकिन विडंबना यह है कि जो नेता सार्वजनिक मंचों से अत्यधिक आक्रामक बयान देते रहे, वही अब संयमित बातचीत और मध्यस्थता की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं।

ऐसे समय में भारत की विदेश नीति विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। भारत ने वैश्विक तनाव के इस दौर में संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण अपनाया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व में भारत ने न तो अनावश्यक बयानबाजी की राजनीति अपनाई और न ही किसी पक्ष के प्रति सार्वजनिक आक्रामकता दिखाई। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए सभी देशों के साथ संवाद और संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया।

भारत की यही नीति आज उसकी सबसे बड़ी ताकत बनती दिखाई दे रही है। भारत अमेरिका से भी मजबूत संबंध रखता है, तो ईरान और खाड़ी देशों के साथ भी सम्मानजनक संबंध बनाए हुए है। रूस के साथ रणनीतिक सहयोग जारी है, वहीं पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक और तकनीकी साझेदारी भी लगातार मजबूत हो रही है। यह संतुलन किसी भी उभरती वैश्विक शक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है। दुनिया के अनेक देशों में ईंधन संकट और महंगाई ने आम जनजीवन को प्रभावित किया है। इसके विपरीत भारत ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रबंधन का परिचय दिया है। ऊर्जा आपूर्ति, आर्थिक स्थिरता और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता को लेकर भारत की स्थिति कई देशों की तुलना में अधिक संतुलित दिखाई देती है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि भारत ने भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय व्यावहारिक कूटनीति को प्राथमिकता दी।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न देशों की यात्राओं के दौरान जिस प्रकार भारत का सम्मान बढ़ा और आर्थिक, तकनीकी तथा रणनीतिक सहयोग से जुड़े समझौते हुए, वह इस बदलती वैश्विक धारणा का संकेत है। आज भारत की बात को विश्व मंच पर गंभीरता से सुना जाता है। भारत केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि एक स्थिर, विश्वसनीय और संतुलित शक्ति के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।

यह भी सत्य है कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र होती है, जहाँ हर बयान का व्यापक प्रभाव पड़ता है। ऐसे समय में संयमित भाषा और संतुलित दृष्टिकोण अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं। विश्व राजनीति का वर्तमान दौर यही सिखा रहा है कि केवल ऊँची आवाज या आक्रामक बयान नेतृत्व की पहचान नहीं होते, बल्कि धैर्य, संतुलन और समयानुकूल निर्णय ही वास्तविक परिपक्वता के प्रतीक हैं।

आज दुनिया जिस अनिश्चितता और संघर्ष के दौर से गुजर रही है, उसमें भारत का संयमित रुख उसे अन्य देशों से अलग पहचान दिला रहा है। यही कारण है कि वैश्विक मंच पर भारत की स्वीकार्यता और प्रभाव दोनों लगातार बढ़ रहे हैं। आने वाले समय में भी यदि भारत इसी संतुलित नीति पर आगे बढ़ता रहा, तो वह केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाला राष्ट्र बन सकता है।

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